शिलांग, 7 नवंबर: मेघालय में 2025 के दौरान 1901 के बाद सबसे अधिक गर्मी दर्ज की गई। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य का वार्षिक औसत तापमान 20.77 डिग्री सेल्सियस रहा, जो 1991–2020 के दीर्घकालिक औसत से 0.96 डिग्री अधिक है।

ये निष्कर्ष IMD के पुणे स्थित जलवायु अनुसंधान एवं सेवा कार्यालय और मेघालय सरकार द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई Statement on Climate for Meghalaya: 2025 रिपोर्ट में सामने आए हैं। इसमें 1901 से उपलब्ध जलवायु रिकॉर्ड के आधार पर तापमान, बारिश के पैटर्न और चरम मौसमी घटनाओं का विश्लेषण किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में मेघालय का न्यूनतम वार्षिक तापमान 1901 के बाद सबसे अधिक रहा, जबकि अधिकतम तापमान रिकॉर्ड में तीसरे स्थान पर रहा। राज्य के पांच सबसे गर्म वर्ष 2025, 2023, 2024, 2021 और 2022 रहे।

1901 से 2025 के बीच मेघालय का वार्षिक औसत तापमान प्रति 100 वर्ष में 0.73 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ा। अधिकतम तापमान में वृद्धि की दर 0.85 डिग्री प्रति शताब्दी रही, जबकि न्यूनतम तापमान में यह दर 0.62 डिग्री रही।

रिकॉर्ड गर्मी के बावजूद 2025 में राज्य में बारिश की भारी कमी दर्ज की गई। मेघालय को अपने वार्षिक दीर्घकालिक औसत का केवल 73 प्रतिशत वर्षा मिली। दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान सामान्य से 43 प्रतिशत कम बारिश हुई। राज्य की कुल वार्षिक वर्षा में दक्षिण-पश्चिम मानसून का योगदान 71.8 प्रतिशत है।

जून से अक्टूबर तक अधिकांश समय बारिश सामान्य से कम रही और जुलाई में सबसे अधिक कमी दर्ज की गई। हालांकि, मानसून-पूर्व अवधि में अधिक बारिश होने से वार्षिक वर्षा की कुल कमी कुछ हद तक कम हुई।

जिला-वार विश्लेषण में शामिल 11 जिलों में से छह में कम बारिश, तीन में सामान्य बारिश, एक में अत्यधिक बारिश और एक में बहुत अधिक कमी दर्ज की गई। साउथ वेस्ट खासी हिल्स में सामान्य से काफी अधिक बारिश हुई, जबकि वेस्ट जैंतिया हिल्स में बड़ी कमी दर्ज की गई।

कुल बारिश कम होने के बावजूद चेरापूंजी, मॉसिनराम और शिलांग सहित कई स्थानों पर भारी बारिश हुई। कुछ स्थानों पर 24 घंटे में 204.5 मिलीमीटर से अधिक वर्षा दर्ज की गई, जो IMD के अनुसार अत्यंत भारी वर्षा की श्रेणी में आती है। वर्ष के दौरान बाढ़, बिजली गिरने, आंधी, तेज हवाओं और ओलावृष्टि की घटनाएं भी दर्ज की गईं।

IMD के अनुसार, यह आकलन कृषि, जल प्रबंधन, ऊर्जा, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों की योजना बनाने में वैज्ञानिक आधार प्रदान कर सकता है।