नई दिल्ली, 5 नवंबर: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि किसी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की 24 घंटे की समयसीमा उसे हिरासत में लिए जाने के क्षण से शुरू होगी, न कि औपचारिक गिरफ्तारी के समय से।
जस्टिस उज्जल भुइयां की अध्यक्षता वाली पीठ ने अपने फैसले में कहा कि हिरासत और गिरफ्तारी, दोनों से व्यक्ति के स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर रोक लगती है।
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के बाद 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया जाता है, तो उसे रिहा करना होगा। पेशी के समय मजिस्ट्रेट को हिरासत में लेने की सटीक तारीख और समय दर्ज करना होगा, ताकि 24 घंटे की समयसीमा के पालन की जांच हो सके।
अदालत ने कहा कि मौलिक अधिकार यूएपीए और पीएमएलए जैसे विशेष कानूनों पर भी प्राथमिकता रखते हैं, जिनमें जमानत का अधिकार काफी सीमित है।
जस्टिस भुइयां ने फैसले में कहा कि संविधान का अनुच्छेद 22(2) गिरफ्तारी से पहले पूछताछ या जांच में लगे समय को 24 घंटे की अवधि से बाहर रखने की अनुमति नहीं देता। संविधान में केवल गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट की अदालत तक यात्रा के लिए जरूरी समय को अपवाद माना गया है।